प्रति,
श्रीमान मुख्यमंत्री महोदय,
उत्तराखंड शासन,
देहरादून.
महोदय,
उत्तराखंड में विभिन्न भर्तियों में घोटालों, खास तौर पर
उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग द्वारा की गयी भर्तियों में धांधलियों के सामने
आने के बाद आपने घोषणा की है कि उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग द्वारा की जाने
वाली भर्तियाँ, अब उत्तराखंड लोकसेवा आयोग करेगा. अखबारों
में प्रकाशित बयानों से ऐसा लगता है कि परीक्षाओं को उत्तराखंड लोकसेवा आयोग को
सौंपना ही बड़ी उपलब्धि समझा जा रहा है.
लेकिन क्या उत्तराखंड लोकसेवा आयोग ऐसी संस्था है, जिसका परीक्षा कराने का रिकॉर्ड बेदाग है और वह बेहद दक्षता और
पारदर्शिता से परीक्षा कराता रहा है ?
महोदय, मेरी जानकारी में
तो ऐसा नहीं है बल्कि अक्सरहां, मामला इसके ठीक विपरीत है.
कुछ उदाहरणों से अपनी बात समझाने की कोशिश करता हूँ.
उत्तराखंड लोकसेवा आयोग ने 2021 में प्रवक्ताओं की भर्ती परीक्षा आयोजित की. इस भर्ती की प्री परीक्षा में अभ्यर्थियों को बुलाने के मामले में ही खुली मनमानी की गयी. जहां गणित विषय में एक पद के सापेक्ष सात अभ्यर्थी बुलाए गए, वहीं हिन्दी में एक पद के सापेक्ष 31 अभ्यर्थी बुलाए गए.
यह लोकसेवा आयोग द्वारा अभ्यर्थियों को बुलाने के स्वयं के मानदंड का भी उल्लंघन था.
प्रश्न यह है कि उत्तराखंड लोकसेवा आयोग द्वारा ऐसा
क्यूं किया गया ? प्रथम दृष्टया तो प्रतीत होता है कि मेरिट
में नीचे के अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया. इससे पहले कि राज्य
सरकार सभी परीक्षाओं को कराने का जिम्मा सौंपे, इस प्रकरण की
जांच होनी चाहिए.
उत्तराखंड लोकसेवा आयोग, वह आयोग है, जो बीते 22 सालों में केवल पाँच पीसीएस की परीक्षा आयोजित करा पाया है. क्या दर्जनों अन्य परीक्षाओं का बोझ वह आयोग झेल पाएगा ? जो अंतिम पीसीएस की परीक्षा, उत्तराखंड लोकसेवा आयोग करवा रहा है, वह छह साल बाद आयोजित हो रही है. उस पीसीएस की प्री परीक्षा की हालत यह थी कि उसमें पूछे गए दर्जन भर सवाल गलत थे.
उससे अधिक सवालों की गलती बताने के लिए आयोग ने अभ्यर्थियों पर पचास रुपया फीस लगा दी यानि यदि किसी अभ्यर्थी को किसी प्रश्न के गलत होने का दावा करना है तो प्रति प्रश्न उसे पचास रुपए चुकाने होंगे.
इस तरह गलत प्रश्न सेट करने वालों
के बजाय प्रश्नों की गलती इंगित करने वालों पर जुर्माना लगाने वाला अनोखा आयोग बना
उत्तराखंड लोकसेवा आयोग !
उत्तराखंड लोकसेवा आयोग के ही तत्कालीन सदस्य, जो कि सेवानिवृत्त जज हैं, पर 2018 में प्रवक्ता
परीक्षा के महिला एवं सामान्य शाखा में साक्षात्कार हेतु चुनी गयी एक युवती ने पैसा
मांगने, छेड़छाड़ और शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव डालने
जैसे गंभीर आरोप लगाए. उक्त युवती की बीते तीन वर्षों में कहीं सुनवाई नहीं हुई.
अब उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक तक शिकायत पहुंचाने के बाद इस प्रकरण में उनके
द्वारा जांच के आदेश दिये गए हैं.
ये उदाहरण बताते हैं कि उत्तराखंड लोकसेवा चयन आयोग
भी लगभग उन्हीं रोगों से ग्रसित है, जिन रोगों से
ग्रसित आयोग की परीक्षा उसे सौंपी जा रही है.
ऐसे वक्त में जब प्रदेश में तमाम भर्ती परीक्षाओं में
धांधली के मामले सामने आ रहे हैं, हड़बड़ी में एक आयोग से दूसरे
आयोग को परीक्षा सौंपने की कार्यवाही से सरकार कुछ करती हुई तो जरूर नजर आ सकती
है. लेकिन साफ-सुथरी पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया स्थापित करने की जरूरत, इससे पूरी नहीं होगी. उत्तराखंड लोकसेवा आयोग के ऊपर जो उदाहरण दिये गए
हैं, उनसे साफ है कि परीक्षा कराने वाली कोई एजेंसी नहीं है, जहां भ्रष्टाचार की सड़ांध न पहुंची हो.
इसलिए परीक्षाओं को उत्तराखंड लोकसेवा आयोग को सौंपने
से पहले सुनिश्चित कर लीजिये कि वहाँ पूरी साफ-सफाई हो जाये. इसके लिए आवश्यक है
कि उत्तराखंड लोकसेवा आयोग द्वारा की गयी नियुक्तियों की भी जांच कारवाई जाए. साथ
ही उत्तराखंड लोकसेवा आयोग में सदस्यों की नियुक्ति का पैमाना भी स्पष्ट होना
चाहिए, वे नियुक्तियों राजनीतिक पक्षधरता नहीं अकादमिक कुशलता के आधार पर होनी
चाहिए.
अंत में पुनः यह मांग है कि प्रदेश में अब तक हुई सभी
भर्तियों की उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की निगरानी में सीबीआई जांच करवाई जाये.
सधन्यवाद,
सहयोगाकांक्षी,
इन्द्रेश मैखुरी
गढ़वाल सचिव
भाकपा(माले)
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